शिक्षक

हर लम्हे जो हमने साथ बिताए थे
वो याद आती हैं
कभी कभी कमियाँ खल जाती हैं

नफरत थी हमारे मन में पढ़ाई के लिए
आपने पढ़ाई के प्रति प्यार जगाया था
हमने समझा था जिसे विष वो
अमृत है ये बताया था

एक तस्वीर थी हमारे मन में गुरु की
खेल – कूद के लिए मना करते हैं वो
हमें अचंभा आया था
जब आपने पढ़ाई को खेल कूद बनाया था

आपने गुरु की नहीं,
एक अलग ही जगह बनाई है हमारे दिल में
जो अभी तक कोई नहीं भर पाया है

आपकी परछाई यहाँ पर है
आप चाहें तो आ जाएं यहाँ पर कोई
दस्तक देने नहीं आया है.

संस्कार गुप्ता, राजधनवार

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